जानिए जातिगत आरक्षण को विस्तार से।
अगर घोडा गधे से तेज दौड़ सकता है तो क्या घोड़े के पैर में आरक्षण की जंजीर बांध दे जिससे गधा आगे निकल जाय और घोडा हार जाए। तेज चलना घोड़े की प्रतिभा है कमजोरी नही।
अगर 40% नम्बर पाने वाला पुलिस अधिकारी बन जाता है 80% नम्बर पाने वाला रोजगार ना मिलने के कारण चोर बन जाता है, तब आप सोचये क्या वो S.P साहब उस चोर को पकड़ पाएंगे जो उनसे ज्यादा दिमाक रखता है।
अगर जातिगत आरक्षण जरूरी था तो इसे भारतीय सेना में क्यों नही लागू किया गया अगर जातिगत आरक्षण से सेना के कमजोर होने का डर था तो पूरे देश के कमजोर होने का डर क्यों नही ?
हमारे सविंधान ने ऐसी प्रजातांत्रिक सिविल सोसायटी की नीवं रखी है जिस का अनुसरण कर हम समानता, स्वतंत्रता और भत्रत्ववाद के जरिए त्रण मूलक सामाजिक - आर्थिक लोकतंत्र स्थापित कर सकते है। आरम्भ में हमारे संविधान ने दलित को समानता प्रदान करने के लिए आरक्षण का केवल दश वर्षो तक ही अस्थायी प्रावधान किया था। जिसमे जितनी जल्दी हो सके हम समतावादी सिविल सोसायटी की स्थापना कर सकें, लेकिन ऐसा अब तक सम्भव नही हो सका है। इसके निम्न कारण है-
1- पहला कारण है की आरक्षण को पूरी ईमानदारी से लागू नही किया गया।
2- दूसरा कारण है की इसको राजनीतिक आधार पर और जटिल बनाने की कोसिस की गयी।
3- आरक्षण प्राप्त दलितों को कभी भी प्रशासनिक व् राजनीतिक जिम्मेदारी नही दी गई जिससे वह खुद इसका समाधान निकाल सकें।
4- आरक्षण प्राप्त नागरिको तथा जातियों का कभी भी निष्पक्ष मूल्यांकन नही किया गया। इसका परिणाम है की आरक्षण प्राप्त नागरिक बार बार आरक्षण प्राप्त करते रहते है और दूसरा निचला दलित सही मायने में आरक्षण प्राप्त कर ही नही पाता।
यह एक वास्तविक समस्या है और अब आरक्षण का भी राजनीतिकरण कर दिया गया है। जिससे आरक्षण का स्तर दिन प्रतिदिन SC,ST से बढकर महिला और OBC तक विस्त्रत होता जा रहा है और अब तो आरक्षण के अन्दर भी आरक्षण की बात चल पड़ी है। जैसे राजस्थान की गुर्जर जाति पहले राज्य की आरक्षण व्यवस्था के अंतर्गत OBC में आरक्षण प्राप्त कर रही थी। लेकिन यकायक वह यह मांग करने लगी की उसकी आरक्षण श्रेणी OBC से रद्द कर मीना जाति के तुल्य अनुसूचित जाति में कर दिया जाय। क्युकी OBC आरक्षण कोटा से उन्हें अन्य जाति के सामान अवसर नही मिल पा रहे है। आरक्षण की जाति ने एक बार फिर हवा पकड़ ली है जैसा की गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों में देखा जा सकता है अब तो हर मजबूत वर्ग को आरक्षण चाहिए।
यह हमारे देश के लिए अजीब विडम्बना है की आरक्षण समाप्त या कम होने को तो रहा, बल्कि और बड रहा है। गुर्जर, पटेल और जाट जाति का आन्दोलन दरअसल दलित राजनीति को एक मुद्दा देता है। लेकिन यह हमारे राजनीतिक नेताओ और नीति निर्माताओ की भी असफलता भी दर्शाता है वह स्वतन्त्रता के इतने वर्षो के पस्चात भी दलित कोटा सिस्टम पूरा नही भर पाए है। जो दलित आरक्षण का लाभ उठा कर सम्पनं हो चुके है उनका आरक्षण खत्म कर देना चाहिए और आरक्षण जातिगत नही होना चाहिए क्युकी कही ना कही इससे समाज पर असर पड रहा है क्युकी गरीबी जाति देख कर नही आती सामान्य वर्ग के लोग भी पिछड़े हो सकते है और उनको भी प्रोत्साहित करने की जरुरत है। सरकारी नौकरियों तथा अन्य जगह पर आरक्षण के आधार पर चयन नही करना चाहिए बल्कि समाज के पिछड़े वर्ग को शिक्षित करना चाहिए तथा उनकी शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए। सरकारी संस्थानों में आरक्षण के द्वारा चयन करने से वो लोग वंचीत रह जाते है जिनमे सच में क़ाबलियत होती है। देश की राजनीति तो सायद ही कभी चाहे की ये जातिगत आरक्षण खत्म किया जाय लेकिन देश के युवाओ को इस गंदे सिस्टम के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए फिर वो युवा किसी भी जाति का क्यों ना हो।
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